|| दंश ले जो तू मुझे, तो नींद आ जाए ||

 

 ||  दंश ले जो तू मुझे, तो नींद आ जाए  ||

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बीते लम्हों का सूनापन

तेरी यादों का महकता चंदन

 आँखों में थमी तेरी परछाई,

रोशनी बनकर बूंदों में घुल जाए ।

 

दंश ले जो तू मुझे, तो नींद आ जाए |

 

कहां मुमकिन है मोहब्बत को

लफ्ज़ों में बयां कर पाना ।

आसान नहीं भुला, यादें

सुकून की नींद में सो जाना ।

 

ज़िस्म से रूह तलक, बस सुकून छा जाए ।

दंश ले जो तू मुझे, तो नींद आ जाए |

 

जीवन के पावन ‘निर्झर’ को,

तुम यूँ ही बह जाने दो ।

एक पल, बस एक पल,

नीले अँधेरे में गुम हो जाने दो ।

 

तारों की चादर ओढ़,

चाँद की रोशनी में खो जाऊं ।

तेरी मोहब्बत की खुशबू में,

खुद को फिर से पा जाऊं ।

 

ज़िस्म से रूह तलक, बस सुकून छा जाए ।

दंश ले जो तू मुझे, तो नींद आ जाए |

 

तेरे बिना सारा जहाँ, सूना सा लगता है,

जैसे एक सिसकी.…

जैसे एक सिसकी ।

ये कैसा अधूरापन ?

ये कैसा सूनापन ?

शायद यही है इश्क़ अपना…

एक मीठा सा पागलपन ।

 

हर खुशी बेमानी, हर नशा अधूरा,

तेरे बिन ये जीवन, एक ख़्वाब ना पूरा ।

तुझसे ही शुरू, तुझपे ही फ़ना,

तेरे बिना अब नहीं , कहीं ठिकाना ।

 

ज़िस्म से रूह तलक, बस सुकून छा जाए,

दंश ले जो तू मुझे, तो नींद आ जाए ।

 

ये रात ठहर जाए, पलकों पे ठहर जाए ।

होठों पे तेरा नाम हो, और सुबह ना आए ।

 

हर ख्वाहिश मिट जाए, बस तू ही तू रह जाए ।

दंश ले जो तू मुझे, तो नींद आ जाए |

 

ज़िस्म से रूह तलक, बस सुकून छा जाए ।

दंश ले जो तू मुझे, तो नींद आ जाए ।

 

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✍️ रचनाकार -- श्री बाल कृष्ण मिश्रा 

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